तत्सम शब्द (Similar Words) किसे कहते है? तत्सम शब्दों के उदाहरण - WebBalaji

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नमस्कार दोस्तो स्वागत है आपका हमारी इस पोस्ट में। क्या आप तत्सम शब्द से जुड़ी जानकारी ढूंढ रहे है जैसे कि तत्सम शब्द किसे कहते है? तत्सम शब्दों के उदाहरण, शब्द किसे कहते है, तद्भव शब्द किसे कहते है? देशक या देशी शब्द किसे कहते है? विदेशी या आगत शब्द किसे कहते है संकर शब्द किसे कहते है आदि तो हमारी इस पोस्ट को शुरू से अंत तक पूरा पढ़े। आपके सभी सवालों के जवाब इस पोस्ट में इस पोस्ट में मिल जाएंगे। तो चलिए बिना देरी किए जानते है तत्सम शब्द, तद्भव शब्द, आगत शब्द और संकर शब्दो के बारे में।

तत्सम शब्द किसे कहते है

शब्द किसे कहते है? परिभाषा

दोस्तो हम तत्सम शब्द, तद्भव शब्द, आगत शब्द और संकर शब्द शब्दो के बारे में जाने उससे पहले हमारे लिए शब्द किसे कहते है? यह जानना ज्यादा जरूरी है तो चलिए पहले हम जानते है कि शब्द किसे कहते है?

एक या अधिक अक्षरों के बनी सार्थक ध्वनि को ‘शब्द’ कहते है। शब्द की परिभाषा निम्न प्रकार की जा सख्ती है-

शब्द की परिभाषा – शब्द अर्थ के स्तर पर भाषा का वह लघुत्तम स्वतंत्र इकाई है जो स्वयं अर्थ व्यक्त करने में समर्थ हो।

शब्द के उदाहरण – तत्सम शब्द, तद्भव शब्द, आगत शब्द और संकर शब्द ।

तत्सम शब्द किसे कहते है? तत्सम शब्दों के उदाहरण

तत्सम शब्द – तत्सम में तत बका अर्थ है ‘वह’ और सम का अर्थ है ‘समान’।

यानी तत्सम उन शब्दों को कहा जाता है, जो संस्कृत जैसे हते हो। हिंदी में अनेक शब्द सीधे संस्कृत भाषा से आए है। संस्कृत में ज्यों के त्यों हिंदी में प्रयोग में आने वाले इं शब्दो को ‘तत्सम शब्द‘ कहते है।

तत्सम शब्द के प्रकार

तत्सम शब्द दो प्रकार के होते है

  • परंपरागत
  • निर्मित

परंपरागत शब्द – संस्कृत साहित्य में उपलब्ध है जैसे कि कक्षा, कन्या, कपोत, कृषि, दुर्बल, कृष्ण, कविता, पदम्, वाणिज्य, विज्ञान आदि।

निर्मित शब्द – निर्मित शब्द नए विचारो, उपकरणों या व्यापार को अभिव्यक्त करने के लिए संस्कृत के व्याकरण के आधार पर समय समय पर बना लिए गए है।

जैसे आचार्य शब्द तो संस्कृत में था पर “प्रिंसिपल” शब्द का अर्थ बनाने वाला शब्द “प्राचार्य” संस्कृत के नियमानुसार आचार्य शब्द से बना लिया गया है।

डॉ रघुवीर ने ऐसे अनेक तत्सम शब्द बनाए है जैसे प्रायोजित, गति अवरोधक, लिपिक आदि।

हिंदी में तत्सम शब्द सबसे अधिक प्रतिष्ठित माने जाते है। उनकी प्रतिष्ठा के निम्नलिखित करें है –

  • तत्सम शब्दों का सम्बन्ध संस्कृत से है।
  • तत्सम शब्दों की परंपरा बहुत प्राचीन है।
  • तत्सम शब्द भारतीय जनता की बहुत बड़ी संख्या के धार्मिक संस्कारों से जुड़े है।
  • तत्सम शब्द ओपचारिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते है।
  • प्राचीन धर्म ओपचारिक में संस्कृत का व्यवहार हुआ है, अतः वेद, पुराण, गीता, महाभारत, रामायण आदि पढ़ने वालो का परिचय तत्सम शब्दों से आसानी से हो जाता है।
  • तत्सम शब्द बचपन से ही सीखने को मिलते है।
  • नव जागरण काल में आर्य समाज आदि ने अपना धर्म प्रचार जिस भाषा में किया उसमे तत्सम शब्दों की ही अधिकता थी।
  • आधुनिक काल में हिंती का जो साहिय लिखा जा रहा, उसमे तत्सम शब्दों का ही बाहुल्य है।
  • हिंदी में स्वतंत्रता के बाद जिन शब्दो का निर्माण किया जाता है, उनका आधार भी तत्सम शब्दावली ही है।
  • शिक्षा एवं जन संचार माध्यमों के विस्तार के कारण भी तत्सम शब्दावली सारे देश में प्रचलित हो गई है। दूरदर्शन से भी तत्सम शब्दावली का प्रसार हुआ है।
  • संविधान में कहा गया है कि हिंदी कि परिभाषिक शब्दावली संस्कृत के आधार पर निर्मित होगी।
  • विदेशो में हिंदी के विद्यार्थी और विद्वान जिस हिंदी को सम्मान की दृष्टि से देखते है, वह तत्सम प्रधान ही है।

हिंदी में तत्सम शब्द कुछ तो सीधे संस्कृत से आए है और कुछ पाली, प्राकृत, अपभ्रंश या बंगला या मराठी से होते हुए परंपरागत रूप से हिन्दी में आए है।

हिंदी में ऐसे शब्दो का प्रधिक्य है। डॉ. उदयनरायान तिवारी के शब्दो में, वस्तुत तत्सम शब्द वे शब्द है जो नव्य आर्य भाषाओं में संस्कृत से उसी रूप में लिए गए है।

संक्षेप में किसी भाषा के मूल शब्दो के तत्सम कहते है। या संस्कृत से यथावत आए हुए शब्दो को तत्सम शब्द कहते है।

जैसे कि पंकज, प्रशांत, व्यक्ति, दुग्ध, आत्मा, कर्पूर,त्वरित, लवण, संध्या, प्रभा, कर्म आदि।

तद्भव शब्द किसे कहते है?

जो शब्द संस्कृत और प्राकृत भाषा से विकृत होकर हिंदी में आए है, उन्हें तद्भव शब्द कहते है।

दूसरे शब्दों में, जो शब्द संस्कृत से उत्पन्न हुए है, या विकसित है, उन्हें तद्भव शब्द कहते है।

संक्षेप में ऐसे शब्द जिनका मूल संस्कृत है, परन्तु विभिन्न प्रभावों के कारण जिनका रूप भिन्न हो गया है, उन्हें तद्भव शब्द कहते है।

इस प्रकार डॉ. उदय नारायण तिवारी के अनुसार, हिंदी तथा अन्य नव्य भारतीय आर्य भाषाओं से तद्भव वे शब्द है, जो इन भाषाओं में तद्भव वे शब्द है, जो इन भाषाओं में मूल संस्कृत से प्राकृत में होते हुए आए है।

संस्कृत शब्द – प्राकृत शब्द – तद्भव शब्द

  • अद्ध. – अज्ज. – आज
  • अग्नि. – आगिन. – आग
  • पुष्प. – पुष्प. – फूल
  • हस्त. – हस्त. – हाथ
  • मध्य. – मज. – में

देशज या देशी शब्द किसे कहते है?

देशज या देशी शब्द – देशज या देशी शब्द उन्हें कहते है, जो अपने ही देश में उत्पन्न हुए है, परन्तु न तो वे तत्सम होते है, न तद्भव और ना ही विदेशी।

दूसरे शब्दों में, जो शब्द हिन्दी में प्रचलित है, किन्तु जिनकी व्युत्पत्ति का कोई पता नहीं चलता है और जो देशी बोलियों में मिलते है, उन्हें देशज या देशी शब्द कहते है।

सरल शब्दों में, देश के बोलचाल के वे शब्द जिनकी व्युत्पत्ति का ठीक ठीक पता नहीं चलता है। देशज या देशी शब्द कहलाते है।

निष्कर्ष – ऐसे शब्द जो संस्कृत शब्दों में विकार से नहीं बने है, बल्कि संस्कृत आदि के समांतर लोक में प्रचलित बोलियों से आए ह।

जैसी लड्डू, लत्ता, निगोड़ा, डिबिया, डोंगा, लोटा, पगड़ी, कटोरा, ठेस, थोथा, धब्बा, खिचड़ी, चेला आदि।

विदेशी या आगत शब्द किसे कहते है?

ये शब्द जो विदेशी भाषाओं से हिन्दी में आए है, उन्हें विदेशी, विदेसज या आगत शब्द कहते है।

हिंदी में विदेशी भाषाओं के अनेक शब्दो का खुलकर प्रयोग होता है। इनमे अंग्रेजी के शब्दों की संख्या सबसे अधिक है। ये शब्द प्राय तद्भव रूप में प्रयुक्त होते है।

जैसे

अंग्रेजी – टिकिट, डॉक्टर, रेल, कप, ऑपरेशन, स्कूल, कलेक्टर, इंजेक्शन, कंपाउंडर, कॉलेज आदि।

पुर्तगाली – कनस्तर, कमीज़, अल्पिन, गमला, नीलम, कमरा, संतरा, चाबी, तम्बाकू, पपीता, मस्तुल, परात, पिपा, अलमारी आदि।

फ़्रेंच – कारतूस, कमीज़, कूपन, एडवोकेट, कॉलर, बेसिन, मार्शल, मेम, मेयर, आगरेज आदि।

डच – चिडी, तुरुप, बम आदि

स्पेनी – सिगरेट, सिगार आदि

जापानी – रिक्शा

चीनी – हंग्यो, हैनसंग, चाय, लीची, चीनी, चाऊ आदि।

तिब्बती – दांडी

यूनानी – दाम, दमड़ी, यवन, कस्तूरी, सुरंग आदि।

रूसी – जार, रूबल, टुंडा, कस्तूरी, सुरंग आदि।

जर्मन – डैक, वेगाना, ट्रेन, सेमिनार आदि।

ईरानी – क्षत्रप, मिहिर, गंज, तीर आदि।

तुर्की – तुर्क, कुली, चिप, चेचक, मुगल, उजबक, खां, सौगात, गलीचा, तमचा आदि।

अरबी – किस्सा, कीमत, दौलत, मशहूर, मशफिर, महल, हलुआ, हैजा आदि।

फारसी – आमदनी, आफत, आवाज, मुर्दा आदि।


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